यह वाक्य किसी धार्मिक प्रवचनकर्ता या सार्वजनिक व्यक्ति द्वारा दिए गए विवादास्पद या आपत्तिजनक बयान की आलोचना करता है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि अनिरुद्धाचार्य जैसे व्यक्ति, जिनसे समाज को संयमित और सम्मानजनक भाषा की अपेक्षा होती है, वह ऐसा बयान कैसे दे सकते हैं जो महिलाओं का अपमान करता हो।
काफी सशक्त, तीखा और सवाल उठाने वाला है। यह एक सामाजिक-नैतिक विरोध को दर्शाता है कि एक धार्मिक व्यक्ति कैसे सार्वजनिक मंच से ऐसी भाषा का प्रयोग कर सकता है, जो महिलाओं की गरिमा के खिलाफ हो।
उदाहरण के तौर पर एक कविता देखिए:
✍️ विरोध में एक कविता:
मां, बहन, बेटियों का अपमान,
अनिरुद्धाचार्य का ये कैसा बयान?
जो धर्म बताए, वही करे धिक्कार,
संस्कारों की आड़ में फैलाए विकार?
नारी को कहे ‘मुंह मार चुकी’,
ऐसी भाषा क्या संतों की?
संस्कारी बनने की देते हैं सीख,
पर खुद की जुबां में ज़हर ही दीख।
ये पाखंड अब और नहीं सहेंगे,
नारी सम्मान की मशाल फिर से जलाएँगे।
धर्म हो जो सच का दर्पण,
न हो उसमें कोई भी ज़हर भरा संपादन।